अपन ह्रदय के आकश बनाऊ – पंकज झा

बंद  करू,
एक  दोसर के,
प्रताड़ित   करव,
अपन  अहँकार  स,
एक  दोसर के झरकैब,
याद  राखु,
अंततः अहाँ,
स्वयं के  दुखी करैत  छी,
कोणठा  मेंनुका-नुका कनै छी,
मरल  मूस  के कतवो  झापव,
दुर्गध घेरवे टा  करत,
ओही  स्मृति  पर  नै  इतराउ,
जे  अहाँ  क खुशी के  ग्रसने अई,
“बिसरू” अ  खुद के  सुखी करू,
एक  टा  बात  पुछू?
खिसियाब  त  नै?
कहीं  अहाँ  भी तरसडेरैलतनैछी,
अपने बात में  हेरैलतनै  छी,
अपने  अइन  ओझरैलत  नै  छी,
कहीं  अपने   व्यवहार स अशांतत  नै  छी,
लोक पर त जादू  चलालेब,
मुदा  भीतर  के शर्मिंदगी  सकेना  बचव,
खालीकरू  स्वयंके भीत रस,
साफ करू  स्वयंके  भीत  रस,
एक  बेर चुप   रहैके,
प्रयाश तकरूभी  तरस,
लोकके  चुपकरेनाईबड्ड आ सान छै,
स्वयंके  बड्ड  कठिन,
एक बेर  स्वयंके  पुछि  यौत  सही,
की  सच मुच  अहाँके  निक  लगैया,
जहन लोक अहाँ सडे  राइया,
कही  अहाँ अई भ्रममेंत  नै छी,
जे अहाँक  धौंस  स,
अहाँ  कका यर ताझ  पाइया,
खुदके  बुरबकी  स  उबरु,
आ  कनि   ऊपर  देखियौ,
खुला  आस  मान,
किछ  फुस  फुसाक,
अहाँक  कान  में  कहैया,
हठ  छोड़ू,
दुनू  हाथ  फैलाऊ,
अपन  ह्रदय  के आकश  बनाऊ,
आ सब  पर  अपन  अमृत  बरसाउ,