उब्जे है हम जिस मिट्टी मे, उसका कर्ज चुकाएंगे

By Niraj Chaudhary:
उब्जे है हम जिस मिट्टी मे, उसका कर्ज चुकाएंगे।
जान की बाजी लगाकर भी, अपनी मां का चीरहरण रूक्वाएंगे।
जिस देश को माँ का दर्जा दिया, जहेर का दूध उसने पिलाया,
जिस माँ को हमने प्यार किया, कंश राज उसने फैलाया,
पूतनाको पार लागाएंगे, कंस राज भी मिटाएंगे,
उब्जे है हम जिस मिट्टी मे, उसका कर्ज चुकाएंगे॥
अपनी ही घरमे की गूलामी, जान लगादि,रोका माँ की बदनामी।
माँ की उन्ही बेटो ने सौतन हमे बनाया है।
देशकी वीर इतिहास से नाम हमारा मिटाया है।
बहुत सहलिया,अब न सहपाएंगे
उब्जे है हम जिस मिट्टी मे,उसका कर्ज चुकाएंगे॥
खेत हमारा,खलियान हमारा अनाज वो लेके जाते है।
मेहनत हमारा,पसिना हमारा लुतफ वो उठाते है।
अनाज उगाके भी,भुके अब हम ना सोपाएंगे
उब्जे है हम जिस मिट्टी मे,उसका कर्ज चुकाएंगे॥
बहुत हुवा तुमहारा ऐ झूठा, बेरग्ङी प्यार
तुमाहारे इस मायाजाल से है हमे इन्कार।
पहिचान चाहिए,हमे चाहिए हमारा अधिकार
होगाया है हमे अब स्वतंत्रता के बिचारो से प्यार
बहुत प्रयास किया, अब और न समझाएंगे
उब्जे है हम जिस मिट्टी मे,उसका कर्ज चुकाएंगे॥