भोजपुरिया संस्कृति में प्रेम प्रतिक ‘सामा चकवा’

By Aanand Gupta
सारा सृष्टि एगो प्रेम के डोरा में बन्धाइल बा । जेह दिन ई प्रेम रुपि डोरा टुट जाई ओह दिन सृष्टि के प्रलय निश्चित बा । मानव सभ्यता के शुरुवात से ही कवनो ना कवनो रुप में हमनी के समाज जे प्रेम के स्थान बा, जवना के चलते ई सृष्टि चल रहल बा । हमनी के समाजिक मुल्य, मान्यता, संस्कृति तबे बा जब लेक प्रेम के अस्तित्व बा । ओहिसे विभिन्न काल खण्ड में हमनी के पुर्वज लोग द्वारा कहानी, काव्य, गीत, नाटक, लोक संस्कृति जइसन विभिन्न रुप में प्रेम के संरक्षण आ संवद्र्धन कइल मिलेला । भावना ही मानव के दोसर जीव से अलग करेला आ ओह कोमल भावना में प्रेम के बीज अंकुरण करावे खातिर हमनी के साँस्कृतिक धरोहर सब में समयानुकुल रीति रिवाज, मान्यता के रुप में प्रेम कथा के स्थान रहेला । प्रेम पूर्णता के प्रतीक ह, मानव के नै–सर्गिक प्राप्त प्रकृति के अनमोल वरदान ह, प्रेम सिमा सर्त बन्देज से पार होला, स्वार्थ रहित होला । दोसर शब्द में कहल जाँव त सारा ब्रह्मान्ड प्रेम में ही समाइल बा ।
सामा चकवा के भी भोजपुरिया सँस्कृति में प्रेम के प्रतीक के रुप में लेहल जाला । एह गीतमय प्रेम गाथा में एक ओर भाइ बहिन के अगाध प्रेम के झलक मिलेला त दोसर ओर प्रेमी के प्रेमिका के प्रति के त्याग आ ओह प्रेम के त्याग के प्रति भाई के आगाध विश्वास, आस्था आ समर्पण के भोजपुरिया समाज बडा श्रद्धा के साथ मनावेला । सामा चकवा बहुत लोकप्रिय आ महत्वपूर्ण भइला के बावजुद भी समाज में आधुनिकता आ पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव के कारण एमें कमी आइल बा । मधेश के संस्कृति के संरक्षण, संवद्र्धन करे खातिर आ विभिन्न रुप में प्रेम के सारा संसार में फैलावे खातिर भी सामा चकवा के बचावल जरुरी बा । सामा चकवा भाइ बहिन के बीच के प्रेम आ बहिन के प्रति भाइ के कर्तब्य दर्शावेवाला गीति कथा ह । एमें लोक गीत के माध्यम से बहिन लोग भाइ के प्रति आपन मन के कोमल भाव उदगार करेली आ अपना भाइ खातिर सुस्वाथ्य आ दिर्घायु के कामना भी करेली । एह गीति कथा में प्रेम के काथे वियोग, इष्र्या, घृणा, बिछोड, मिलन, सब रस पूर्ण मिलेला जवना कारण से ई जनमानस में लोकप्रिय भी बा ।
सामा चकवा कार्तिक महिना के शुक्लपक्ष के एकम से शुरु होके पूर्णिमा के १५ दिन में समाप्त होला । एह क्रम में बहिन लोग माटि के विभिन्न स्वरुप एगो डलिया में बनावेली लोग जेमे सामा–चकवा के मूर्ति, सतभैया के मूर्ति, चुँगला के मूर्ति आ ओकरा सँगे औरी मूर्ति भी बनाबल जाला । मूर्ति में जौ रोपल जाला आ डलिया में खर भी राखल जाला । उहे मूर्ति भइल डलिया के लेके रोज चरावल जाला आ पानी पियावल जाला । मान्यता बा कि जेतने जौ बढी ओतने भाई के संमृद्धि मिली । एह १५ दिन में सामा चकवा के विभिन्न कथा गीत के रुप में गावल जाला आ भाइ बहिन के प्रेम के प्रतीक के रुप में गीतमय ढंग से परोसल जाला जवना के हमनी के समाज पर बहुत बडका असर रहेला । सामा चकवा के दौरान रोज डलिया में राखल खर में आगी लगा के प्रेम के बिरोधी आ षडयन्त्रकारी के चुँगला के मुह झौस देहल जाला । सामा चकवा के कुछ गीतन पर नजर डालला पर पारिवारिक, समाजिक, साँस्कृतिक झलक मिलेला, जइसे ः
डाला ले बोहोर भइली खिरलिच बहिनी
सेहो डलवा छिनी लिहले चकउवा भैया हो राम सजनी
मतलव जब डाला में मूर्तियन के सजा के जब बहिन सामा चकवा खेले चल तारी उनकार भाई डाला छिन लेत बाडन, ओह पर माई कहत बाडी
देउ भालु पुत रे धियवा के डालवा
मोरे धिया भइली पहुनिया हो राम सजनी
मतलब माई अपना बेटा के डाटत समझावतारी कि डाला काहे छिन लेलऽ ? डाला देदऽ , खेलेदऽ , बेटी त अब पहुनी हो जइहन । ओहि पर भाई पुछतारन
कथिए के डालवा तोरे हउवे रे बहिनी
कथिए लगवले चारु पाँवठी हो राम सजनी
मतलब भाई पुछतारन जे हे बहिन ई डाला काथि के ह ? डाला के चारु पाँव में काथि लागल बा ? ओहपर बहिन जबाब देतारी
काँचे काँचे बाँस के डालवा हो भैया
चम्पा चमेलिया चारु पाँवठी हो राम सजनी
मतलब ई डाला काँच बाँस के ह आ चारु पाँव में चम्पा आ चमेली के फूल सपवले बानी बहिन कहतारी । अइसे सामा चकवा के दौरान गीतमय रुप में परिवार के स्वरुप के झलक मिलेला । एगो दोसर गीत के ओर देखला पर ः
केकरा खेतवा जोतावल गहुँवा बोवावल
डिभिया लहसिजाला डिभिया बिहसिजाला
मतलब बहिन पुछतारी कि ई केकार खेत जोतावल बा ? गँहु बोवावल बा ?
ओहपर सातु भाई के नाव लेके आ सँगे सँगे बहिन लोग आपन–आपन भाई के नाम लेके गावेला लोग ः
चकवा भैया के खेतवा जोतावल गँहुवा बोवावल
डिभिया लहसिजाला डिभिया बिहसिजाला
पहाड भैया के खेतवा जोतावल गँहुवा बोवावल
डिभिया लहसिजाला डिभिया बिहसिजाला
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अइसहि सब भाई के नाव लेके बहिन लोग गावेला आ ओकरा बाद जब भाई के सिकार खेलत देख के बहिन के मन में डर होला जे भाई के कुछ हो ना जाए ई सोच के बहिन रोवे लागेली ः
एहिपार चकवा हो भैया खेलेलन सिकार
ओहिपार खिरलिच बहिना रोदन पसार
बहिन के रोवत सुन के भाई आवेलन आ कहेलन जे हे बहिन तू काहे रोवतारु हम बाबुजी के सम्पति में से आधा तोहरा के दे देम ः
चुप होजा चुप होजा बहिन हो हमार
बाबा के सम्पितिया हो बहिना आधा देबो बांट
एहपर बहिन कहेली जे बाबुजी के सम्पिति सब तोहार आ भतिजा के हि ह, हम त पुर परदेशी हो गइनी, खाली पवनी त्यौहार में मोटरी लियादेबऽ इहे आसारा बा ः
बाब के सम्पितिया हो भैया भतिजवा के बा
हम त दुर देशी बहिनिया मोटरिए के आश
ओहि पर भाई कहेलन कि जब जब कार्तिक माहना आई धान कटाइब, तब तब चिउरा, ठेकुवाँ केसार ले के जरुर आइब ः
आवे देहु कार्तिक मासवा कटइबो कतिका हो धानवा
चिउरा केसरवा हो बहिना भरबो हो फफार
अइसही सामा चकवा में भाई बहिन के प्रेम आ सम्बन्ध के बारे में बहुत बढिया रुप में चित्रण मिलेला । प्राचीन किम्दन्ती अनुसार चुँगला के भडकावा में पर श्रीकृष्ण के सराप के चल्ते चिरई के जुनी में चल गइल श्रीकृष्ण के बेटी श्यामा आ पति चारुवक्य भी पत्नी बियाग में भगवान शंकर के वरदान से चिरई रुप धारण कर लेवेलन । श्यामा के भाइ साम्ब के बहिन प्रति के अगाध स्नेह के कारण प्रेम के कारण विष्णु भगवान के घोर तपस्या कके विष्णु भगवान के आदेशानुसार वृंदावन में १५ दिन तकले सामा चकवा के प्रेम गाथा गावल जाला जेसे सामा आ चाकवा के चिरई के जुनी से मुक्ति मिलेला विश्वास के साथ सामा चकवा भोजपुरिया समाज में धुमधाम से मनावल जाला ।