रङ्ग–उमङ्गक साँस्कृतिक पर्व फगुआ

श्यामसुन्दर यादव ‘पथिक’:   होरी अर्थात फगुआ रंगक त्यौहार थिक । मिथिलाञ्चलमे अहि पर्वके मिथिला बासीसभद्धारा रंगोत्सवके रुपमे मनाओल जाईत छैक । होरी अर्थात फगुवा पावनिके लग सऽ देखल जाई तऽ प्रेम, सदभाव आ भाईचाराक सम्बन्ध विस्तार करवला पर्व थिक । जाड सँ उन्मुक्ति पावि वसन्त ऋतु फागुण पुर्णिमाके दिन मनाओल जाईबला ई पर्व विश्वके महत्वपूर्ण सन्देश दऽ रहल अछि । केओ किछ कहए मुदा किन्हो नहि मानव मिथिलावासी एक जुट छथि,  एक दोसरके विचमे सदभाव छथि से सन्देश देवए मे हम सभ सफल छी ।

holi

बसन्त ऋतुके हरियालिक स्वागत संगहि मिथिलाबासी फागुण मासमे झुमि उठैत छथि । कियाक त अगहन मासक धान सहितक बालि घर प्रवेश करा फुर्सतके क्षण सेहो पवैत छथि आऽ एम्हर गहुमक बालि सेहो पाकके अवस्थामे पहुच गेल रहैत छैक । तै मिथिलावासी सभक खुशि सँ मोन झुमि उठिनाई स्वभाविक थिक । अहि खुशियाली सभके प्रस्फुटित करएमे सफल मानल गेल अछि, होरी अथवा फगुवा पावनि । बसन्त पञ्चमी अर्थात सरस्वती पूजाक दिन सँ रंग अविरक प्रारम्भ भऽ जाईत छैक । सरस्वतीये पुजा दिन किर्तनिया मण्डली सभ होरीक गित गावि फगुवाक स्वागत करैत छैक । तकर बाद गाम गाममे रात्रिकालिन समयमे होरी अर्थात फगुवा गेवाक कार्य प्रारम्भ भऽ जाईत अछि ।

मिथिला क्षेत्रक लोक सभ रात्रिक भोजन कएलाक बाद दलान या चौपाढिमे एक्कठा भऽ होरीके पुर्व तैयारीमे होरी गित सभ गाव जुटि जाईत छथि । मदमस्त मासके रुपमे मानल जायवाला फागुणमे बुढवोमे जवानी अबैत छैक से कहब मिथिलाञ्चलमे अछि । जकर नमुना गामघरके बुढपुरान लोकसभ होरी गेवाक लेल आगा रहैत छथि । आ युवा जमात सभ मुकदर्शक भ देखैत रहैत छथि । अपन उमरके विसरि बृद्ध सभ झुमरा, जोगिरा, फगुवा गेवामे पाछा नहि हटैत छथि । कहल जाईत अछि जे होरीमे उमर नहि देखल जाइए । बरिस भरिमे एक दिन अपन दुःख पीडा विसरी हर्षोल्लासके साथ ई पावनि मनाओल जाईत अछि ।
गित, संगित, कला, संस्कृति, भेषभुषा आ परम्पराक उर्वर भुमि मानल जायवाला मिथिला अर्थात मधेश भुमिके सदैत एकटा अलग विषेशता आ पहिचान रहलैक अछि । विश्व समुदायके आगा हमसभ गर्वके साथ कहि सकैत छी, जे हम सभ मिथिलावासी छि । एकर श्रेय हमसभ अपन पुर्खा पुर्वजके देबए विना नहि रहि सकैत छी । जे कि गाम घरमे रहएवाला हमर अहाके पुर्खा सभ संस्कृतिके सहेजके अखन धरि रखन छथि । मुदा आव अर्थात २१ म शताब्दीमे बढैत आधुनिकता सँगहि हमर अहाँके पावनि त्यौहार, परम्परा आ संस्कृति उपर प्रहार भऽ रहल अछि । वर्तमान युवा पिढी धीरे धीरे आधुनिकताके बजारमे अपन परम्पराके पाछा छोडि रहल अछि । ओ सभ आधुनिकताके पुजारी बनैत जाऽ रहल अछि ।

एक दशक पहिने धरि श्रीपञ्चमीयेके दिनसँ गाम घरमे होरी गएवाक कार्य शुरु जाईत छल, मुदा आव एहि कार्यमे कमी देखल जा रहल अछि । रात्रि ९ बजेके बाद प्रायः सभ गाम–घरक पुरुष लोकनि एक ठाम जम्मा भ होरी गबैत छल । आब अहि क्रममे किछु कमि देखवामे अबैत अछि । पौराणिक होरी गीतक स्थान तऽ अखन रंग विरंगक अश्लिलता सँ भरल होरी गितक कैसेट लऽ रहल अछि । जे हमर अहाँके संस्कृति उपर प्रहार तऽ करिऐ रहल अछि संगहि अश्लिलता आ छाडापनके न्यौत सेहो दऽ रहल अछि । ओना त होरीमे कनि नोंक–झाेंक आ अश्लिलता रहबे करैत अछि, मुदा परत भितर रहैय । बजारमे होरी गित सम्बन्धि गित सभ एनाई निक बात थिक, मुदा चर्चाके होडबाजीमे अश्लिलता आ परम्परा पर प्रहार नहि होयबाक चाही । परम्परा सऽ जुडल गीत होयवाके चाही । ओना त होरीके विषयमे पौराणिक खिस्सा सेहो अछि ।
हिरण्यकश्यपुके पुत्र छल, प्रहलाद् । जे भगवानके अनन्य भक्त छल, मूदा हुनक पिता हिरण्यकस्यपु भगवान अर्थात देवता विरोधी छल । प्रहलादके मारवाक लेल बहुतरासँ प्रपञ्च रचैत छल, हुनक पिता हिरण्यकस्यपु । ताहि क्रममे विष्णु भक्त प्रहलाद्के जान सँ मारबाक लेल हिरण्यकश्यपु अपन बहिन होलीकाके जिम्मा दैत छथि । बालक प्रहलाद्के आगिमे लऽ होलिका बसि जाईत छैक, मुदा प्रहलाद्के किछ नहि होइत छैक । आ एम्हर होलीका जरिक भष्म भऽ जाईत छैक ।
तैं सत्य पर अटल रहलाके कारणे प्रहलाद् सकुशल आगिसँ बाहर आवि जाईत छैथ । आसुरी शक्ति उपर दैवी शक्तिके विजय होयवाक दिनके स्मरण करैत मिथिलामे होरी पावनि मनेवाक परमपरा चलैत आवि रहल अछि ।
असत्य उपर सत्यके विजय भेलाक अवसरमे विजयोत्सवके रुपमे प्रायः सभ गाममे कमसे कम होलीका दहन कएल जाइत अछि । ढोलक, हारमुनियम, झाइल मृदङ्ग, डम्फा सहितके बाद्यवादन सभ बजाकए होरी गीत गाओल जाईत अछि । होरीक पूर्वक राति गाम घरके लोक सभ होरी गीत गाबैत गामक सिमान पर जा समत जरबैत छथि । आ होरी अर्थात फागुन पुर्णिमाके दिन घर घर सकर सँ बनल पुवा पुडि सहितके पकवान आ परिकार सभ बना भोग लगाक परसादके रुपमे ग्रहण करैत अछि । संगहि जिनका घरमे पावनि नहि होएत अछि, हुनका सभके अपन घर बजाके खुएवाक परम्परा एखनो कायम अछि ।
मुख्यतया फगुवासऽ सम्बन्धित गीत सभ राधा–कृष्ण, शिव–गौरी, सिता–राम, पति–पत्नी, जिजा–साली, दियर–भौज, प्रेमि–प्रेमिका सँ सम्बन्धित रहैत अछि । होरी गितक किछु पाइत अहि प्रकार अछिः

होरी खेले रघुवीरा अवधमे, होरी खेले रघुविरा
किनकर हाथ कनक पिचकारी, किनकर हाथ अविरा
होरी खेले रघुविरा, अवधमे होरी खेले रघुविरा…

एक दिश खेले कुमर कन्हैया, एक दिश खेले होरी हो
एक दिश खेले मोहन मुरारी, दोसर दिश राधा प्यारी हो

शिव मण्ठ पर फहराबए लाल धुजा
शिब मण्ठ पर………………..

जगदम्बा जी खेलत फाग जोगिनी संग लियो ……………….

तहिना होरी गीत सभमे त कनि मस्ती आ अश्लिलताक झलक रहबे करैत अछि । जाहि कारणे युवा मात्र नहि बृद्ध सभक देहमे सेहो मस्तीके सञ्चार भऽ जाइत अछिः
सर रर सरकी नाचे पतकी पैसा लिय मोटकी…

बैगन बारी करैला तोड गेलए लटकी बैगन बाडी…..
पैरमे गडि गेलै कुशम केर रे काँट………..
असगर कोना जायब, नैहर दुर रे बलमुवा………………
अहि प्रकारक होरी गीतसभ देहमे जोश भरवाक काज करैत अछि । जाहिमे जोगिडाके त अपने बिशेषता अछि । जेनाः

कोन ताल पर ढोलक बाजे कोन ताल मजिरा ….
आब जोडी हो कथिए केर टुटल ए छौडा हरबहना,कथिए करे टुटल कमार
कथिए केर टुटल ए छौडी रे पतरकी, कथिए केर टुटल लोहार…………………….
किन्हका पोखरीयामे ए झिलमिल पनियाँ, किनका पोखरीयामे श्यामार
किनका पोखरीयामे चेल्हवा मछरीया कौन पापी फेकए महजाल…………….

समग्रमे कहल जाय त हर्सोल्लासक पर्व थिक होरी अर्थात फगुवा । अहि पर्वमे देवर भौजी आऽ जिजा सालीके बिषेश महत्व रहैत अछि । एक दोसरके रंग अविर लगाक इ पर्व मनाओल जाईत अछि । होरीमे ओना त नैना भुटका आ किशोर सभ बाँसक पिचकारी बनाके रंग खेलैत अछि । मुदा आव तऽ बाँसक पिचकारीक जगह आधुनिक प्लाष्टिकके पिचकारी ल लेलक अछि ।
ओना त मिथिलाके युवक सभ अहि पावनिमे अपनाके कृष्ण आ युवती सभ राधा बुझैत छथि । संगहि संङ्गी–तुरीयाके सङ्ग रङ्ग अबिर लगाके सेहो होरी मनेवाक परम्परा मिथिलामे कायम अछि । एतवे नहि अपन सऽ पैघ व्यक्तिके पैर पर अबीर चढा कए प्रणाम करवाक विशिष्ट नमूना मिथिलामे बिद्यमान अछि । मिथिलाञ्चलक ई स्वस्थ्य एवं अलौकिक परम्परा धीरे–धीरे लोप भऽ रहल अछि ।
होरी पावनिमे विकृति ऐलाक कारणें एकर महत्व घटैत जा रहल अछि । पहिने भाङ्ग पिवा धरिके काज होइत छल होरीमे । मुदा आव भाँंगक जगह ल लेलक अछि देशी विदेश दारुसभ । जाहि नशाके कारणें स्वस्थ होरी कतेको ठाम बदनाम सेहो भ रहल अछि । तंै मिथिलाबासीके सचेत भेनाइ आवश्यक अछि ।
कविश्वर चन्दा झा कहने छथि–
मिथिला फूकत शंख, धैर्य केर डोलि रहल अछि आसन
माँगल नहि छिनल जाईत इतिहासक सिंहासन
अपन संस्कृतिके संरक्षण नहि करब त लोप होयवामे आ विकृतिक प्रवेशमे बहुत समय नहि लागत । तंै सम्पुर्ण मिथिलावासीसभ उठी, जागी आ अपन संस्कृतिके संरक्षण करी । मिथिलाक सुन्दर नगरीकें प्रदुषित होयबा सँ बचाबी । अपने सभक फगुआ सुखद् होय ।
(लेखक मैथिली साहित्य परिषद राजविराजक सचिव छथि। )

 

सुन गै बुधनी – श्यामसुन्दर यादव

अंग अंग तोहर सुन्दरता सँ भरल
मदमस्त जवानी छौ चढल
रुपक जादुस सुगन्धित पवन
बिजली गिरवै छौ, तोहर नयन
सुन गै बुधनी तोरे कहै छियौ……

Shyam Sundar Yadav

Shyam Sundar Yadav

संस्कृति आ संस्कार बदलैत जाइछौं
अप्पन पहिरण पर सुटबुट चढल जाइछौं
लाज शरमकेर पर्दा खुजैत जाइछौं
मुँहस मिथिलाकेर मिश्री बोल बदलल जाइछौ
सुन गै बुधनी तोरे कहै छियों ………….

बाबु माय भैया छोडि डैड, मम ब्रो कहै छै
साइकिलक कि बात ? मोटर मारुती चढै छे
गै मस्का–मस्कीके जवानीके शान बुझै छे
चलैत बाट हँसी ठहाँका आ खुब हिंहियाइ छे
सुन गे बुधनी तोरे कहै छियौ …………….

अतित तोरा बेमतलवी बकबास बुझाई छौ
डलरक नशामे इमान तोहर लिलाम भेल जाइछौ
नाता–सम्बन्धक नामपर कुकृत्य बढल जाइछौ
चहुँदिस दुर–दुर छियाके पदवीक ढेरी लागत जाइछौ
सुन गै बुधनी तोरे कहै छियौं ……………

गै कतए बन्धकी राखले अपप्न संस्कृतिके
अप्पन चालि छोडि  खजन चिडई चालि चलै छे
गै रोजे रोज संगी बनवैत आ छोडैत जाई छे
हुस्नक नशामे जिस्मक खरिद–बिक्री ब्यापार करै छे
सुन गै बुधनी तोरे कहै छियौं ……………

पूmलमे भँवरा ओहिना लोभेबे करैत छैक
रंगीन दुनियाँ हसीन त बुझेवे करैत छैक
एहेनमे त गलत डेग सहिये बुझाईत छैक
टाकाक पाँछा त नैतिकता सेहो खाक बुझाईत छैक
सुन गै बुधनी तोरे कहै छियौं …………………

गै सुगन्ध बिनु फूलकेर महत्व कि ?
संस्कृति–सभ्यता विहिन ओ मानव कि ?
लाज आ संस्कार विहिन नारीक पहिचान कि ?
गै परदा बिनु ओ घरक श्रृंगार कि ?
सुन गै बुधनी तोरे कहै छियौं ……………

सोच एक बेरी जनक आ सुनयनाक बेटी
गै आबो स्वाभिमानक बात सोच कि कहियो बेसी
क्षणिक सुखक हिसाब–किताब करए परतौ भुक्तानी
दिन एहेन एतौ केओ नहि सुनतौ तोहर कहानी
सुन गै बुधनी तोरे कहै छियौं

 

बाल गजल -कुन्दन कुमार कर्ण

फूल पर बैस खेलै छै तितली
डारि पर खूब कूदै छै तितली
Kundan
भोर आ साँझ नित दिन बारीमे
गीत गाबैत आबैछैतितली

लाल हरिअर अनेको रंगक सभ
देखमे नीक लागै छै तितली

पाँखिफहराक देखू जे उडि-उडि
दूर हमरासँ भागै छै तितली

नाचबै हमहुँ यौ कुन्दन भैया
आब जेनाक नाचै छै तितली

कामना अहिँक लेल – श्यामसुन्दर यादव

काल्हि धरि जे अप्पन छल
आइ ओ बिरान भ गेल ।
जीनगीक सभटा सपना
सपने बनि रहि गेल । ।
छल जीनगी अहिंक लेल
किया बिरान बनि गेल ।
खुशी सभटा अहि छलौ
किया नयन नोर भरि गेल ।।
बिश्वासक अटुट ताग
आइ किये टुटि गेल ।
आँखिक दिव्य ज्योति
के लुटिके ल गेल ।।
बाटक बटोहीके उडान
आइ किया ठमकि गेल ।
जारी अछि पथिकक यात्रा
सहयात्री किया छुटि गेल । ।
फूसियोक ओ झग्गड
महाभारत बनि गेल ।
सुख–दुःख बँटैत छलौ
आइ कतए हरा गेल ।।
सदिखन जे पोछैत छल नोर
मुदा आइ कत हरा गेल ।
लागल चोट एहन
कलेजा दू टुक भ गेल ।।
जानि नहि पएलौं हम
भूल कतए भ गेल ।
सोचि नहि पएलौं
नहि जानि की भ गेल ।।
नजरि लागल केकर
ई की भ गेल ।
समर्पण सभटा हमर
बेकार किया बनि गेल ।।
मोन दिल अहाँक
किया रंग फेर गेल ।
त्याग समर्पणके लतियाबैत
नजानि ओ की क गेल ।।
बाट जोहैत रहलौं हम
ओ लतियाबैत चलि गेल ।
सभटा बात अहाकेँ
बुझाएल नेनाक खेल । ।
भेटल हमरा मृत्यू दण्ड
ओ हँसैत चलि गेल ।
भेटल अहाँक आजादी
हमरा सदाक लेल जेल ।।
जीवनक नवरंग मिलैत रहए
खेलैत रहु खुशीक खेल ।
होइत रहए जीत अहाँके
कामना अहिक लेल ।।

कतय छै सहिद ? श्यामसुन्दर यादव

आजादीक खातिर जे जानक आहुति द गेल
छातिमे गोली वरण करैत जे हँसैत रहि गेल
सदति ओ मुक्ति, मुक्ति रट लगवैत रहि गेल
न्याय, समानता आ सुशासन खोजैत रहि गेल
हे हौ भाइ तोही कह, एखन कत छै ओ सहिद ?

Shyam Sundar Yadav
मातृभूमीक कसम खा, ओ सदति लडैत रहि गेल
गुजगुज अन्हरियाक तड्कामे ओ घर छोडि गेल
दुश्मनसँ लडए जा रहल छी, बस एतबा कहि गेल
आँधी, तुफान आ चट्टानसँ टकराइत रहि गेल
हे हौ भाइ तोही कह, एखन कत छै ओ सहिद ?

बेटाक लेल राखल सनेश पौँतियेमे साँठले रहि गेल
मुनियाँ बहिनक राखी, थारीमे ओहिना सजले रहि गेल
खुशीक सपना सभटा बाबुजीक बटुवामे कसले रहि गेल
अगिला सालक रंग अबिरक होरी, अतित बनिके रहि गेल
हे हौ भाइ तोही कह, एखन कत छै ओ सहिद ?

अप्पन सोनितसँ स्वतन्त्रताक ईतिहास रचैत रहि गेल
मायक ममताक आँचर सोनितसँ भिजते रहि गेल
बचपनके टोनाटोनी, रुसाफूली, नुका चोरी अतित बनि गेल
भविष्यक सपना सारा, कोशी कमला बनि नोरमे बहि गेल
हे हौ भाइ तोही कह, एखन कत छै ओ सहिद ?

सहिदक बलिदानी, निलामीक व्यापार होइते रहि गेल
मुक्तिक उत्कट पियास लए, मरुभूमीमे तडपैत रहि गेल
सत्ता भत्ताक खरिद बिक्री आ दाउ पेंच होइते रहि गेल
जाली फट्हा आ शोषकके बाउग बुबुआइते रहि गेल
हे हौ भाइ तोही कह, एखन कत छै ओ सहिद ?

पैरबी पट्टाक बलपर सहिदक सूची बढिते रहि गेल
दिनोदिन सहिदक घोषणा क्रमशः होइते रहि गेल
कथित सहिद बनए, झूठमूठक नौटंकी सेहो होइते रहि गेल
खुनक धार आ बलिदानी कथी लए सवाल उठिते रहि गेल
हे हौ भाइ तोही कह, एखन कत छै ओ सहिद ?

अपन ह्रदय के आकश बनाऊ – पंकज झा

बंद  करू,
एक  दोसर के,
प्रताड़ित   करव,
अपन  अहँकार  स,
एक  दोसर के झरकैब,
याद  राखु,
अंततः अहाँ,
स्वयं के  दुखी करैत  छी,
कोणठा  मेंनुका-नुका कनै छी,
मरल  मूस  के कतवो  झापव,
दुर्गध घेरवे टा  करत,
ओही  स्मृति  पर  नै  इतराउ,
जे  अहाँ  क खुशी के  ग्रसने अई,
“बिसरू” अ  खुद के  सुखी करू,
एक  टा  बात  पुछू?
खिसियाब  त  नै?
कहीं  अहाँ  भी तरसडेरैलतनैछी,
अपने बात में  हेरैलतनै  छी,
अपने  अइन  ओझरैलत  नै  छी,
कहीं  अपने   व्यवहार स अशांतत  नै  छी,
लोक पर त जादू  चलालेब,
मुदा  भीतर  के शर्मिंदगी  सकेना  बचव,
खालीकरू  स्वयंके भीत रस,
साफ करू  स्वयंके  भीत  रस,
एक  बेर चुप   रहैके,
प्रयाश तकरूभी  तरस,
लोकके  चुपकरेनाईबड्ड आ सान छै,
स्वयंके  बड्ड  कठिन,
एक बेर  स्वयंके  पुछि  यौत  सही,
की  सच मुच  अहाँके  निक  लगैया,
जहन लोक अहाँ सडे  राइया,
कही  अहाँ अई भ्रममेंत  नै छी,
जे अहाँक  धौंस  स,
अहाँ  कका यर ताझ  पाइया,
खुदके  बुरबकी  स  उबरु,
आ  कनि   ऊपर  देखियौ,
खुला  आस  मान,
किछ  फुस  फुसाक,
अहाँक  कान  में  कहैया,
हठ  छोड़ू,
दुनू  हाथ  फैलाऊ,
अपन  ह्रदय  के आकश  बनाऊ,
आ सब  पर  अपन  अमृत  बरसाउ,